Wednesday, May 22, 2019

"कृष्ण-लीला"

सूरदासजी प्रतिदिन ही श्रीकृष्णजी को पद सुनाया करते थे और प्रतिदिन की तरह आज भी कृष्ण ने सूरदासजी के हाथों में इकतारा देकर कहा :~ ‘सुनाओ कोई नया पद, आज तुम बजाओ और मैं नाचूँगा।’::अभी सूरदास जी इकतारे का स्वर मिला ही रहे थे कि ना जाने कृष्णजी को क्या सूझा। उन्होंने सूरदासजी के हाथ से इकतारा ले लिया 

सू और बोले :~ ‘तुम रोज गाते बजाते हो और मैं सुन-सुनकर नाचता हूँ, पर आज मैं गाऊँगा-बजाऊँगा और तुम नाचोगे।’::‘मैं नाचूँ..!! यह क्या कौतुक है कान्हा, मुझ बूढ़े को नचाओगे, पर मुझे नाचना आता ही कहाँ है..??’::कृष्ण बोले:- ‘नहीं, नहीं.. आज तो नाचना ही पड़ेगा।’‘अच्छा कान्हा, मैं नाच लूंगा, पर कितनी बार नचाओगे। चौरासी लाख (योनि) बार मुझे नचाकर भी तुम्हारा मन नहीं भरा, अब ओर ना नचाओ कान्हा।’
अब मैं नाच्यौ बहुत गुपाल।काम-क्रोध कौ पहिरि चोलना, कंठ विषय की माल॥महामोह के नुपूर बाजत, निंदा-सब्द-रसाल।भ्रम भोयौ मन भयौ पखावज, चलत असंगत चाल॥तृष्ना नाद करति घट भीतर, नाना विधि दै ताल।माया को कटि फेंटा बाँध्यौ, लोभ-तिलक दियौ भाल॥कोटिक कला काछि दिखराई, जल-थल सुधि नहिं काल।सूरदास की सबै अविद्या, दूरि करौ नँदलाल॥::इस प्रकार श्री बालकृष्ण की अनेकों लीलाएं हैं, जिन्हें पढ़ने और मनन करने से मन आनन्द विभोर हो जाता है ~::रे मन, गोविन्द के ह्वै रहियै।इहिं संसार अपार बिरत ह्वै, जम की त्रास न सहियै॥दुख, सुख, कीरति, भाग आपनैं आइ परै सो गहियै।सूरदास भगवंत-भजन करि अंत बार कछु लहियै॥
. *'सूरश्याम की जय हो..!!'

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